पृथ्वी की उत्पत्ति सम्बन्धी द्वैतारक परिकल्पना की विवेचना

पृथ्वी की उत्पत्ति मानव के लिए आरम्भ से ही जिज्ञासा का विषय रही है। आकाश में फैले असंख्य तारों, ग्रहों और नक्षत्रों को देखकर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि पृथ्वी और सौरमंडल का निर्माण कैसे हुआ होगा। इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अनेक परिकल्पनाएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें निहारिका परिकल्पना, ज्वारीय परिकल्पना, ग्रहाणु परिकल्पना आदि प्रमुख हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परिकल्पना द्वैतारक परिकल्पना है, जो सौरमंडल और पृथ्वी की उत्पत्ति को तारों के आपसी संबंधों के आधार पर समझाने का प्रयास करती है।

द्वैतारक परिकल्पना का मूल विचार यह है कि हमारा सूर्य प्रारम्भ में अकेला तारा नहीं था, बल्कि वह एक द्वैत प्रणाली का हिस्सा था। अर्थात सूर्य के साथ एक और तारा भी मौजूद था और दोनों एक-दूसरे के चारों ओर परिक्रमा कर रहे थे। खगोल विज्ञान में यह ज्ञात तथ्य है कि ब्रह्माण्ड में अनेक तारे द्वैत या बहु-तारकीय प्रणालियों में पाए जाते हैं। इस आधार पर यह कल्पना की गई कि सूर्य भी प्रारम्भ में ऐसे ही किसी द्वैतारक तंत्र का सदस्य रहा होगा।

इस परिकल्पना के अनुसार सूर्य और उसका सहचारी तारा एक-दूसरे के अत्यंत समीप आए। इस समीपता के कारण दोनों तारों के बीच तीव्र गुरुत्वाकर्षण बल उत्पन्न हुआ। इस गुरुत्वीय प्रभाव के कारण सूर्य के बाहरी भाग से विशाल मात्रा में गैसीय और द्रव्य पदार्थ बाहर की ओर खिंच गया। यही पदार्थ धीरे-धीरे सूर्य के चारों ओर फैल गया और एक चक्राकार रूप ले लिया। इस चक्राकार पदार्थ से आगे चलकर ग्रहों, उपग्रहों और अन्य खगोलीय पिंडों का निर्माण हुआ।

द्वैतारक परिकल्पना यह मानती है कि ग्रहों का निर्माण अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया थी। सूर्य से अलग हुआ पदार्थ पहले छोटे-छोटे खंडों में विभाजित हुआ। इन खंडों ने गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से एक-दूसरे से टकराकर बड़े पिंडों का रूप लिया। यही पिंड आगे चलकर ग्रह बने। पृथ्वी भी इन्हीं पिंडों में से एक थी, जो धीरे-धीरे ठंडी होकर ठोस रूप में परिवर्तित हुई।

इस परिकल्पना में यह भी माना गया है कि द्वितीय तारा, जिसने सूर्य से पदार्थ को अलग करने में भूमिका निभाई, बाद में सूर्य से दूर चला गया या नष्ट हो गया। वर्तमान समय में सूर्य के पास किसी ऐसे तारे की उपस्थिति नहीं मिलती, इसलिए वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया कि वह तारा या तो सौरमंडल से बाहर निकल गया या किसी अन्य प्रक्रिया के कारण समाप्त हो गया होगा। इसी कारण आज सौरमंडल एक एकल-तारकीय प्रणाली के रूप में दिखाई देता है।

द्वैतारक परिकल्पना की एक विशेषता यह है कि यह ग्रहों की कक्षाओं और उनकी गति को समझाने का प्रयास करती है। इस सिद्धांत के अनुसार जब सूर्य से पदार्थ बाहर की ओर खिंचा गया, तो उसमें पहले से ही घूर्णन गति मौजूद थी। इसी घूर्णन के कारण ग्रह एक ही समतल में लगभग वृत्ताकार कक्षाओं में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी की कक्षा और उसकी घूर्णन गति को भी इसी संदर्भ में समझाया गया है।

इस परिकल्पना में पृथ्वी की आंतरिक संरचना को भी अप्रत्यक्ष रूप से समझाने का प्रयास किया गया है। प्रारम्भिक अवस्था में पृथ्वी अत्यंत गर्म और द्रव अवस्था में थी। समय के साथ-साथ जब यह ठंडी हुई, तो भारी तत्व केंद्र की ओर और हल्के तत्व ऊपर की ओर चले गए। इससे पृथ्वी की परतों का निर्माण हुआ। यद्यपि यह विचार अन्य परिकल्पनाओं में भी मिलता है, फिर भी द्वैतारक परिकल्पना इसे सूर्य से पृथ्वी के अलग होने की प्रक्रिया से जोड़ती है।

द्वैतारक परिकल्पना का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह ब्रह्माण्ड में पाए जाने वाले द्वैत तारों के वास्तविक उदाहरणों पर आधारित है। खगोलविदों ने यह देखा है कि अनेक तारे जोड़ों में पाए जाते हैं और उनके बीच जटिल गुरुत्वीय संबंध होते हैं। इस कारण यह कल्पना पूरी तरह काल्पनिक नहीं लगती कि सूर्य भी कभी ऐसी ही किसी प्रणाली का भाग रहा हो। इसके अतिरिक्त यह सिद्धांत ग्रहों की समान दिशा में परिक्रमा और उनके कोणीय संवेग को समझाने में सहायक माना गया।

हालाँकि इस परिकल्पना के समक्ष कई कठिनाइयाँ भी हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आज सूर्य के निकट किसी द्वितीय तारे का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। यदि ऐसा तारा वास्तव में मौजूद था, तो उसके अस्तित्व के कुछ संकेत अवश्य मिलने चाहिए थे। इसके अलावा यह भी प्रश्न उठता है कि सूर्य जैसे विशाल तारे से इतनी बड़ी मात्रा में पदार्थ अलग होना कितना संभव था। आधुनिक खगोल भौतिकी के अनुसार किसी तारे से इस प्रकार पदार्थ का अलग होना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है।

एक अन्य आलोचना यह है कि इस परिकल्पना से ग्रहों के द्रव्यमान और उनकी रासायनिक संरचना को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया जा सकता। पृथ्वी और अन्य ग्रहों में पाए जाने वाले तत्वों की विविधता को समझाने के लिए अतिरिक्त मान्यताओं की आवश्यकता पड़ती है। इसी कारण कई वैज्ञानिकों ने इस परिकल्पना को पूर्ण समाधान के रूप में स्वीकार नहीं किया।

इसके बावजूद द्वैतारक परिकल्पना का ऐतिहासिक और वैचारिक महत्व कम नहीं है। इसने वैज्ञानिकों को सौरमंडल की उत्पत्ति के बारे में नए दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित किया। यह परिकल्पना इस बात का उदाहरण है कि विज्ञान में किसी भी समस्या को समझने के लिए अनेक संभावनाओं पर विचार किया जाता है और समय के साथ अधिक सटीक सिद्धांत विकसित होते हैं।

इस प्रकार द्वैतारक परिकल्पना पृथ्वी की उत्पत्ति को सूर्य और एक सहचारी तारे के पारस्परिक गुरुत्वीय संबंधों के माध्यम से समझाने का प्रयास करती है। यह परिकल्पना भले ही आज पूर्ण रूप से स्वीकृत न हो, लेकिन पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति से संबंधित वैज्ञानिक विचारों के विकास में इसका महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

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