भौतिकी में संवेग एक ऐसा मौलिक विचार है जो किसी वस्तु की गति को गहराई से समझने में हमारी सहायता करता है। दैनिक जीवन में हम अक्सर किसी चलती हुई वस्तु को देखकर यह अनुमान लगाते हैं कि वह कितनी “जोर” से आ रही है या टकराने पर कितना प्रभाव डालेगी। यही “जोर” या प्रभाव वैज्ञानिक रूप में संवेग की धारणा से जुड़ा होता है। संवेग केवल गति का ही माप नहीं है, बल्कि इसमें वस्तु का द्रव्यमान भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसी कारण हल्की और भारी वस्तुएँ समान वेग होने पर भी अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न करती हैं।
भौतिकी के अनुसार, किसी वस्तु का संवेग उसके द्रव्यमान और वेग के गुणनफल के बराबर होता है। यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान अधिक है और वह तेज गति से चल रही है, तो उसका संवेग भी अधिक होगा। इसे गणितीय रूप में p = mv से व्यक्त किया जाता है, जहाँ p संवेग, m द्रव्यमान और v वेग को दर्शाता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि संवेग एक संयुक्त भौतिक राशि है, जो द्रव्यमान और वेग दोनों पर निर्भर करती है।
संवेग की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह एक सदिश राशि है। इसका अर्थ यह है कि संवेग में केवल परिमाण ही नहीं, बल्कि दिशा भी होती है। किसी वस्तु का संवेग उसी दिशा में होता है जिस दिशा में वह गति कर रही होती है। उदाहरण के लिए, यदि कोई गेंद पूर्व दिशा में जा रही है, तो उसका संवेग भी पूर्व दिशा में होगा। यदि वही गेंद पश्चिम दिशा में चले, तो उसका संवेग भी बदल जाएगा। इस प्रकार दिशा परिवर्तन से संवेग में भी परिवर्तन हो जाता है, चाहे द्रव्यमान और वेग का परिमाण समान ही क्यों न हो।
संवेग का स्वरूप समझने के लिए द्रव्यमान की भूमिका को समझना आवश्यक है। द्रव्यमान वस्तु की जड़ता का माप है, अर्थात् वह गुण जो किसी वस्तु को अपनी गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करने की क्षमता देता है। भारी वस्तु को रोकना या उसकी गति बदलना कठिन होता है, जबकि हल्की वस्तु को अपेक्षाकृत आसानी से रोका जा सकता है। जब यही जड़ता गति के साथ मिलती है, तब संवेग का निर्माण होता है। इसलिए, एक तेज गति से चलती भारी ट्रक और उतनी ही गति से चलती एक साइकिल के संवेग में बहुत अंतर होगा।
संवेग का स्वरूप केवल परिभाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यवहारिक पहलू भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। टक्कर की घटनाओं में संवेग की भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जब दो वस्तुएँ आपस में टकराती हैं, तो उनके संवेग में परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन की प्रकृति टक्कर के प्रकार पर निर्भर करती है, जैसे प्रत्यास्थ और अप्रत्यास्थ टक्कर। प्रत्यास्थ टक्कर में कुल संवेग संरक्षित रहता है और गतिज ऊर्जा भी बनी रहती है, जबकि अप्रत्यास्थ टक्कर में गतिज ऊर्जा का कुछ भाग अन्य रूपों में परिवर्तित हो जाता है, परंतु संवेग का संरक्षण फिर भी लागू रहता है।
संवेग के स्वरूप का एक और महत्वपूर्ण पहलू इसका संरक्षण नियम है। संवेग संरक्षण का नियम कहता है कि यदि किसी तंत्र पर कोई बाह्य बल कार्य नहीं कर रहा है, तो उस तंत्र का कुल संवेग अपरिवर्तित रहता है। यह नियम भौतिकी के सबसे मूलभूत नियमों में से एक है और इसके अनुप्रयोग बहुत व्यापक हैं। रॉकेट का उड़ना, बंदूक से गोली का निकलना, या दो बिल्लीयर्ड गेंदों का टकराना, ये सभी घटनाएँ संवेग संरक्षण के नियम पर आधारित हैं। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि संवेग केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की अनेक प्रक्रियाओं की कुंजी है।
संवेग का संबंध बल से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। न्यूटन के गति के दूसरे नियम को यदि संवेग के संदर्भ में देखा जाए, तो यह कहा जा सकता है कि किसी वस्तु पर लगने वाला बल उसके संवेग के परिवर्तन की दर के बराबर होता है। इसका अर्थ यह है कि जब किसी वस्तु पर बल लगाया जाता है, तो उसका संवेग बदलता है। बल जितना अधिक होगा या जितनी अधिक देर तक लगाया जाएगा, संवेग में परिवर्तन उतना ही अधिक होगा। इसी विचार से आवेग की संकल्पना भी विकसित होती है, जो संवेग परिवर्तन से सीधे संबंधित है।
संवेग का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि गति का प्रभाव केवल वेग पर निर्भर नहीं करता। कई बार हम देखते हैं कि धीमी गति से चलने वाली भारी वस्तु भी गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है, जबकि तेज गति से चलने वाली हल्की वस्तु का प्रभाव सीमित हो सकता है। यह अंतर संवेग के कारण ही होता है। उदाहरण के लिए, धीरे-धीरे चलती एक भारी मशीन को रोकना कठिन होता है, जबकि तेज गति से चलती एक हल्की गेंद को हाथ से रोका जा सकता है। इन स्थितियों में संवेग की मात्रा और उसका परिवर्तन निर्णायक भूमिका निभाता है।
संवेग का एक और स्वरूप इसके मापन में दिखाई देता है। संवेग की SI इकाई किलोग्राम मीटर प्रति सेकंड होती है। यह इकाई यह दर्शाती है कि संवेग द्रव्यमान और वेग दोनों का संयुक्त परिणाम है। मापन की यह पद्धति हमें विभिन्न वस्तुओं के संवेग की तुलना करने में सहायता करती है और यह समझने में मदद करती है कि कौन-सी वस्तु अधिक प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
इस प्रकार संवेग का स्वरूप बहुआयामी है। यह द्रव्यमान और वेग का संयोजन है, सदिश प्रकृति रखता है, संरक्षण नियम का पालन करता है और बल तथा टक्कर जैसी घटनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। संवेग के माध्यम से हम गति से संबंधित घटनाओं को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक रूप में समझ पाते हैं, जो भौतिकी के अध्ययन को न केवल तार्किक बल्कि जीवन से जुड़ा हुआ बनाता है।