स्वतंत्रता के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था में हुए संरचनात्मक परिवर्तनों की व्याख्या

भारत को 1947 में जब स्वतंत्रता मिली, तब देश की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, औद्योगिकीकरण का अभाव, पूंजी की कमी, निरक्षरता और बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ देश के सामने थीं। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना प्राथमिक क्षेत्र यानी खेती-किसानी पर आधारित थी, जबकि आधुनिक उद्योग और सेवा क्षेत्र बहुत सीमित थे।

लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास का मार्ग अपनाया और कई योजनाओं, नीतियों और सुधारों के ज़रिए देश की अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन (Structural Changes) लाए गए। संरचनात्मक परिवर्तन का अर्थ है—देश की आर्थिक संरचना यानी विभिन्न क्षेत्रों (कृषि, उद्योग, सेवा) के बीच संतुलन, उत्पादन के साधनों, श्रम, पूंजी, व्यापार, और नीति-व्यवस्था में बड़े बदलाव।

नीचे स्वतंत्रता के बाद से हुए कुछ प्रमुख संरचनात्मक परिवर्तनों की व्याख्या की गई है:


1. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक और सेवा आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव

स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा कृषि क्षेत्र पर निर्भर था। 1950 में कृषि क्षेत्र GDP में लगभग 50% से अधिक योगदान करता था, लेकिन समय के साथ इसका योगदान घटता गया।

  • औद्योगिक विकास:
    भारत सरकार ने भारी उद्योगों, लघु उद्योगों और सार्वजनिक उपक्रमों को बढ़ावा दिया। विशेष रूप से दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956) से औद्योगीकरण की नींव रखी गई। स्टील, कोयला, बिजली, इंजीनियरिंग और रसायन जैसे क्षेत्रों में सरकारी निवेश हुआ।
  • सेवा क्षेत्र का विकास:
    1991 के आर्थिक सुधारों के बाद बैंकिंग, बीमा, संचार, सूचना प्रौद्योगिकी और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों ने तेज़ी से विकास किया। आज सेवा क्षेत्र भारत की GDP का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है।

2. नियोजित अर्थव्यवस्था से उदारीकरण की ओर

1951 से भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से नियोजित अर्थव्यवस्था की शुरुआत की। इसमें सरकार की भूमिका निर्णायक थी और उत्पादन, मूल्य निर्धारण, निवेश जैसे फैसले केंद्र सरकार लेती थी।

लेकिन 1991 में देश ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति (LPG Policy) अपनाई, जिसके बाद:

  • सरकारी नियंत्रण कम हुआ।
  • निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिला।
  • व्यापार और टैक्स से जुड़ी कई रुकावटें हटाई गईं।

इससे भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ गया और उद्यमिता को बढ़ावा मिला।


3. भूमि सुधार और कृषि तकनीकों में बदलाव

स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधारों के ज़रिए ज़मींदारी प्रथा को समाप्त किया गया, किसानों को भूमि का स्वामित्व मिला और भूमिहीनों को ज़मीन देने का प्रयास किया गया।

1960 के दशक में हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन में भारी वृद्धि की। HYV बीज, सिंचाई, रासायनिक खाद और मशीनों के प्रयोग से गेहूं और चावल की पैदावार में रिकॉर्ड वृद्धि हुई।

हालाँकि, यह परिवर्तन सीमित क्षेत्रों (जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) तक ही सीमित रहा।


4. श्रम बल का स्थानांतरण

स्वतंत्रता के समय अधिकांश श्रमिक कृषि में लगे हुए थे। लेकिन औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के साथ-साथ श्रमिकों का प्रवाह अब उद्योग और सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ा है।

  • गाँवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा।
  • शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण ने युवा पीढ़ी को नए क्षेत्र में काम करने के लिए तैयार किया।
  • अब अधिकतर लोग व्यापार, बैंकिंग, IT, टूरिज़्म, हेल्थकेयर आदि क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

5. विदेशी व्यापार और पूंजी प्रवाह में परिवर्तन

1947 में भारत का विदेशी व्यापार सीमित और आयात-आधारित था। लेकिन समय के साथ भारत ने:

  • निर्यात प्रोत्साहन की नीतियाँ अपनाईं।
  • IT और सेवा निर्यात में बड़ा योगदान देना शुरू किया।
  • FDI (Foreign Direct Investment) और FII (Foreign Institutional Investment) को आकर्षित किया।

1991 के बाद भारत वैश्विक व्यापार का एक सक्रिय भागीदार बन गया।


6. नवाचार, तकनीक और डिजिटल अर्थव्यवस्था का विकास

2000 के बाद भारत ने डिजिटल तकनीक, मोबाइल क्रांति और इंटरनेट सेवाओं में बड़ी छलांग लगाई। इससे:

  • ऑनलाइन बैंकिंग, UPI, डिजिटल भुगतान लोकप्रिय हुए।
  • स्टार्टअप और ई-कॉमर्स कंपनियों की संख्या बढ़ी।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और प्रशासन में तकनीक का प्रयोग बढ़ा।

सरकार की “डिजिटल इंडिया” और “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाओं ने भी इस दिशा में परिवर्तन को तेज़ किया।


7. गरीबी और सामाजिक विकास में सुधार

हालाँकि गरीबी अभी भी एक चुनौती है, फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण योजनाओं और रोज़गार गारंटी जैसे उपायों से लोगों की जीवन गुणवत्ता में सुधार आया है।

  • प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई।
  • सरकारी योजनाओं जैसे MGNREGA, PDS, DBT आदि ने सामाजिक सुरक्षा को मज़बूत किया।

इन तमाम परिवर्तनों के कारण आज भारतीय अर्थव्यवस्था एक विविध, गतिशील और वैश्विक अर्थव्यवस्था बन चुकी है, जो लगातार विकास की ओर अग्रसर है।

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