साधनात्मक अनुकूलन से तात्पर्य उस सीखने की प्रक्रिया से है, जिसमें कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने व्यवहार को एक साधन के रूप में प्रयोग करता है। इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति यह सीखता है कि कौन सा व्यवहार उसके लिए उपयोगी है और कौन सा नहीं। यदि किसी व्यवहार के बाद उसे संतोषजनक या लाभदायक परिणाम मिलता है, तो वह व्यवहार धीरे-धीरे मजबूत होता जाता है और भविष्य में उसके दोहराए जाने की संभावना बढ़ जाती है। इसके विपरीत यदि किसी व्यवहार के बाद अप्रिय या हानिकारक परिणाम मिलते हैं, तो वह व्यवहार कमजोर पड़ जाता है।
साधनात्मक अनुकूलन की जड़ें एडवर्ड थॉर्नडाइक के प्रयोगों में मिलती हैं। उन्होंने बिल्लियों पर किए गए अपने प्रसिद्ध “पज़ल बॉक्स” प्रयोगों के माध्यम से यह बताया कि सीखना मुख्य रूप से प्रयास और त्रुटि की प्रक्रिया है। बिल्ली शुरू में कई तरह की निरर्थक क्रियाएँ करती है, लेकिन जैसे ही संयोग से सही क्रिया हो जाती है और उसे भोजन मिल जाता है, वही क्रिया धीरे-धीरे सीख ली जाती है। थॉर्नडाइक ने इसे “प्रभाव का नियम” कहा, जिसके अनुसार सुखद परिणाम व्यवहार को मजबूत करते हैं और दुखद परिणाम उसे कमजोर करते हैं। यहाँ व्यवहार एक साधन बन जाता है, जिसके द्वारा व्यक्ति या जीव अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है।
दूसरी ओर प्रवर्तन अनुकूलन को साधनात्मक अनुकूलन का ही अधिक विकसित और व्यवस्थित रूप माना जाता है। इस अवधारणा को मुख्य रूप से बी. एफ. स्किनर ने प्रस्तुत किया। प्रवर्तन अनुकूलन में इस बात पर विशेष जोर दिया जाता है कि व्यवहार को नियंत्रित और आकार देने में प्रवर्तन यानी reinforcement की क्या भूमिका है। स्किनर के अनुसार अधिकांश मानवीय व्यवहार स्वैच्छिक होता है और वह उसके परिणामों द्वारा नियंत्रित होता है। यदि किसी व्यवहार के बाद सकारात्मक प्रवर्तन मिलता है, जैसे प्रशंसा, पुरस्कार या सफलता, तो वह व्यवहार मजबूत होता है। इसी तरह नकारात्मक प्रवर्तन में किसी अप्रिय स्थिति के हट जाने से भी व्यवहार की पुनरावृत्ति बढ़ सकती है।
प्रवर्तन अनुकूलन में दंड की भूमिका पर भी चर्चा की जाती है। दंड का उद्देश्य किसी अवांछित व्यवहार को कम करना होता है, लेकिन स्किनर का मानना था कि दंड व्यवहार को स्थायी रूप से समाप्त नहीं करता, बल्कि केवल अस्थायी रूप से दबा देता है। इसके अलावा दंड के कई नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं, जैसे भय, तनाव और आक्रामकता। इसलिए प्रवर्तन अनुकूलन में व्यवहार सुधार के लिए सकारात्मक प्रवर्तन को अधिक प्रभावी और उपयोगी माना जाता है।
यदि साधनात्मक अनुकूलन और प्रवर्तन अनुकूलन की तुलना की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि दोनों का मूल विचार लगभग समान है। दोनों ही यह मानते हैं कि व्यवहार और उसके परिणामों के बीच संबंध के आधार पर सीखना होता है। अंतर मुख्य रूप से प्रस्तुति और विस्तार का है। साधनात्मक अनुकूलन अपेक्षाकृत प्रारंभिक अवधारणा है, जिसमें व्यवहार को लक्ष्य प्राप्ति का साधन माना गया है। प्रवर्तन अनुकूलन उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए प्रवर्तन के प्रकारों, समय-सारिणी और व्यवहार के क्रमिक निर्माण पर अधिक गहराई से विचार करता है।
शिक्षा के क्षेत्र में इन दोनों सिद्धांतों का विशेष महत्व है। कक्षा में शिक्षक जब छात्रों को अच्छे कार्य के लिए प्रशंसा, अंक या अन्य प्रोत्साहन देते हैं, तो वे प्रवर्तन अनुकूलन के सिद्धांत का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छात्र यह सीखते हैं कि नियमित अध्ययन, समय पर कार्य पूरा करना और अनुशासन बनाए रखना उन्हें सकारात्मक परिणाम दिलाता है। धीरे-धीरे यही व्यवहार उनकी आदत बन जाता है। इसी तरह अनुशासनात्मक नियमों का पालन न करने पर मिलने वाले दंड से कुछ हद तक अवांछित व्यवहार में कमी लाई जाती है, हालांकि आधुनिक शिक्षा में दंड की तुलना में सकारात्मक प्रवर्तन को अधिक महत्व दिया जाता है।
दैनिक जीवन में भी साधनात्मक और प्रवर्तन अनुकूलन के अनेक उदाहरण मिलते हैं। एक व्यक्ति मेहनत करता है क्योंकि उसे वेतन, पदोन्नति या सामाजिक सम्मान मिलता है। कोई बच्चा इसलिए पढ़ाई करता है क्योंकि अच्छे अंक लाने पर उसे माता-पिता की सराहना या कोई उपहार मिलता है। वाहन चलाते समय नियमों का पालन करने की आदत भी इसी प्रकार विकसित होती है, क्योंकि नियम तोड़ने पर जुर्माना या सजा का डर होता है और पालन करने पर सुरक्षा और मानसिक संतोष मिलता है।
इन सिद्धांतों की आलोचना भी की गई है। कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानव व्यवहार को केवल बाहरी प्रवर्तन से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। व्यक्ति की आंतरिक प्रेरणा, भावनाएँ, सोच और मूल्य भी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। फिर भी यह स्वीकार किया जाता है कि साधनात्मक और प्रवर्तन अनुकूलन सीखने की प्रक्रिया को समझने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं, विशेषकर उन स्थितियों में जहाँ व्यवहार को स्पष्ट रूप से देखा और मापा जा सकता है।
इस प्रकार साधनात्मक अनुकूलन और प्रवर्तन अनुकूलन यह स्पष्ट करते हैं कि सीखना केवल जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि व्यवहार और उसके परिणामों के बीच बने संबंधों का परिणाम है। मनुष्य अपने अनुभवों से यह सीखता है कि कौन सा व्यवहार उसके लिए लाभदायक है और कौन सा नहीं, और इसी आधार पर वह अपने भविष्य के व्यवहार को ढालता रहता है।