नौबतखाने में इबादत (Naubatkhane Mein Ibadat) Class 10: बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और उनकी संगीत साधना पर आधारित इस पाठ का पूरा सार, व्याख्या और प्रश्न-उत्तर यहाँ प्राप्त करें। बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए सबसे सरल नोट्स।

लेखक परिचय: नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
लेखक का नाम : यतींद्र मिश्र
- जन्म – 12 अप्रैल 1977 ई०
- जन्म स्थान – अयोध्या, उत्तरप्रदेश
- एम० ए० – लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी भाषा और साहित्य में
- वे साहित्य, संगीत, सिनेमा, नृत्य और चित्रकला के जिज्ञासु अध्येता हैं।
- उनके अबतक तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
- ‘यदा-कदा’,
- ‘अयोध्या तथा अन्य कविताएँ’,
- ‘ड्योढ़ी पर आलाप’
- वे अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘सहित’ का संपादन कर रहे हैं।
- उन्होंने प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक ‘गिरिजा’ लिखी।
- भारतीय नृत्यकलाओं पर विमर्श की पुस्तक है ‘देवप्रिया’, जिसमें भरतनाट्यम और ओडिसी की प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मान सिंह से यतींद्र मिश्र का संवाद संकलित है।
- यतींद्र मिश्र ने स्पिक मैके के लिए ‘विरासत 2001’ के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित पत्रिका ‘थाती’ का संपादन किया है।
- वे साहित्य और कलाओं के संवर्धन एवं अनुशीलन के लिए एक सांस्कृतिक न्यास ‘विमला देवी फाउंडेशन’ का संचालन 1999 ई० से कर रहे हैं।
- वे रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि द्विजदेव की ग्रंथावली का सह-संपादन भी किये हैं ।
- उन्होंने हिंदी के प्रसिद्ध कवि कुँवरनारायण पर केंद्रित दो पुस्तकों लिखे हैं तथा
- हिंदी सिनेमा के जाने-माने गीतकार गुलजार की कविताओं का संपादन ‘यार जुलाहे’ नाम से किया है।
- पुरस्कार –
- भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार,
- भारतीय भाषा परिषद् युवा पुरस्कार,
- राजीव गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार,
- रजा पुरस्कार,
- हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार,
- ऋतुराज सम्मान
- उन्हें केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली और सराय, नई दिल्ली की फेलोशिप भी मिली है।
पाठ परिचय : नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
‘नौबतखाने में इबादत’ प्रसिद्ध लेखक और संस्कृति-प्रेमी यतींद्र मिश्र द्वारा लिखा गया एक बहुत ही मार्मिक और प्रेरक व्यक्ति-चित्र है। यह पाठ विश्वप्रसिद्ध शहनाई वादक, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जीवन – उनकी रूचियाँ, अंतर्मन की बुनावट, संगीत की साधन आदि गहरे जीवनानुराग और संवेदना के साथ अनछुए पहलुओं को हमारे सामने लाता है।

पाठ का सारांश : नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रस्तुत पाठ ‘नौबतखाने में इबादत‘ में शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की जीवनचर्या का उत्कृष्ट वर्णन किया गया है। इन्होंने किस प्रकार शहनाई वादन में बादशाहत हासिल की, इसी का लेखा-जोखा इस पाठ में है। 1916 ई० से 1922 ई० के आसपास काशी के पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर के ड्योढ़ी के उपासना-भवन से शहनाई की मंगलध्वनि निकलती है। उस समय बिस्मिल्ला खाँ छः साल के थे। उनके बड़े भाई शम्सुद्दीन के दोनों मामा अलीबख्श तथा सादिक हुसैन देश के प्रसिद्ध सहनाई वादक थे।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव (बिहार) में एक संगीत-प्रमी परिवार में 1916 ई0 में हुआ। इनके बचपन का नाम कमरूद्दीन था। –वह छोटी उम्र में ही अपने ननिहाल काशी चले गये और वहीं अपना अभ्यास शुरू किया। 14 साल की उम्र में जब वह बालाजी के मंदिर के नौबतखाने में रियाज के लिए जाते थे, तो रास्ते में रसूलनबाई और बतूलनबाई का घर था। इन्होंने अनेक साक्षात्कारों में कहा है कि इन्ही दोनों गायिकी-बहनों के गीत से हमें संगीत के प्रति आसक्ति हुई।
शहनाई को ’शाहनेय’ अर्थात् ’सुषिर वाद्यों में शाह’ की उपाधि दी गई है। अवधी पारंपरिक लोकगीतों और चैती में शहनाई का उल्लेख बार-बार मिलता है । बिस्मिल्ला खाँ 80 वर्षों से सच्चे सुर की नेमत माँग रहें हैं तथा इसी की प्राप्ति के लिए पाँचों वक्त नमाज और लाखों सजदे में खुदा के नजदिक गिड़गिड़ाते हैं। उनका मानना है कि जिस प्रकार हिरण अपनी नाभि की कस्तूरी की महक को जंगलों में खोजता फिरता है, उसी प्रकार कमरूद्दीन भी यहीं सोचते आया है कि सातों सुरों को बरतने की तमीज उन्हें सलीके से अभी तक क्यों नहीं आई।
बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई के साथ जिस मुस्लिम पर्व का नाम जुड़ा है, वह मुहर्रम है। इस पर्व के अवसर पर हजरत इमाम हुसैन और उनके कुछ वंशजों के प्रति दस दिनों तक शोक मनाया जाता है। इस शोक के समय बिस्मिल्ला खाँ के खानदान का कोई भी व्यक्ति न तो शहनाई बजाता है और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में भाग लेता है। आठवीं तारीख खाँ साहब के लिए खास महत्त्व की होती थी। इस दिन वे खड़े होकर शहनाई बजाते और दालमंडी से फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते थे।
बिस्मिल्ला खाँ अपनी पुरानी यादों का स्मरण करके खिल उठते थे। बचपन में वे फिल्म देखने के लिए मामू, मौसी तथा नानी से दो-दो पैसे लेकर सुलोचना की नई फिल्म देखने निकल पड़ते थे।
बिस्मिल्ला खाँ मुस्लमान होते हुए भी सभी धर्मों के साथ समान भाव रखते थे। उन्हें काशी विश्वनाथ तथा बालाजी के प्रति अपार श्रद्धा थी। काशी के संकटमोचन मन्दिर में हनुमान जयन्ती के अवसर पर वे शहनाई अवश्य बजाते थे। काशी से बाहर रहने पर वे कुछ क्षण काशी की दिशा में मुँह करके अवश्य बजाते थे।
उनका कहना था – ’क्या करें मियाँ, काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मन्दिर यहाँ।’ काशी को संगीत और नृत्य का गढ़ माना जाता है। काशी में संगीत, भक्ति, धर्म, कला तथा लोकगीत का अद्भुत समन्वय है। काशी में हजारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित कंठे महाराज, विद्याधरी, बड़े रामदास जी और मौजद्दिन खाँ थे। बिस्मिल्ला खाँ और शहनाई एक दुसरे के पर्याय हैं। बिस्मिल्ला खाँ का मतलब बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई।
एक शिष्या ने उनसे डरते-डरते कहा- ’बाबा आपको भारतरत्न मिल चूका है, अब आप फटी लुंगी न पहना करें।’ तो उन्होंने कहा- ’भारतरत्न हमको शहनाई पर मिला है न कि लुंगी पर। लुंगीया का क्या है, आज फटी — है तो कल सिल जाएगी। मालिक मुझे फटा सूर न बक्शें।
निष्कर्षतः बिस्मिल्ला खाँ काशी के गौरव थे। उनके मरते ही काशी में । संगीत, साहित्य और अदब की बहुत सारी परम्पराएँ लुप्त हो चुकी हैं। वे दो कौमों के आपसी भाईचारे के मिसाल थे। खाँ साहब शहनाई के बादशाह थे। यही कारण है कि इन्हें भारत रत्न, पद्मभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा अनेक विश्वविद्यालय की मानद उपाधियाँ मिलीं। वे नब्बे वर्ष की आयु में 21 अगस्त, 2006 को खुदा के प्यारे हो गए। (नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10)

पाठ्य पुस्तक के प्रश्नोत्तर : नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 1. डुमराँव की महत्ता किस कारण से है ?
उत्तर – डुमरांव की महत्ता शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खाँ के कारण है, क्योंकि इस महान शहनाई वादक का जन्म बिहार के इसी गाँव में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। इसके अलावा शहनाई और डुमरांव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं।
शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से खोखली होती है, जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। नरकट नामक घास से इस रीड का निर्माण होता है और यह घास डुमरांव के आसपास की नदियों के कगारों में पाई जाती है। इस प्रकार डुमरांव की महत्ता शहनाई के कारण है।
नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 2. सुषिर वाद्य किन्हें कहते हैं। ‘शहनाई’ शब्द की व्युत्पत्ति किस प्रकार हुई है ?
उत्तर – सुषिर वाद्य ऐसे वाद्य हैं जिनमें नाड़ी होती है और जिन्हें फूँक कर बजाया जाता है। सुषिर वाद्यों में शहनाई, मुरली, वंशी, श्रृंगी, मुरछंद आदि आते हैं, पर उनमें शहनाई को ‘शाहनेय’ अर्थात सुषिर वाद्यों में ‘शाह’ की उपाधि दी गई है। इसका कारण यह है कि शहनाई की ध्वनि हमारे हृदय को स्पर्श करती है।
नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 3. बिस्मिल्ला खाँ सजदे में किस चीज के लिए गिड़गिड़ाते थे ? इससे उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष उद्घाटित होता है ?
उत्तर – बिस्मिल्लाह खाँ जब इबादत में अल्लाह के सामने सर झुकाते थे, तो सजदे में गिड़गिड़ाकर अल्लाह से सच्चे सुर का वरदान मांगते। उनको यकीन था कि कभी खुदा उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उनकी ओर उछालेगा। बिस्मिल्लाह खाँ की इन बातों से यह पता चलता है कि वह एक धार्मिक, संवेदनशील और निरभिमानी व्यक्ति थे और संगीत साधना के प्रति समर्पित थे।
नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 4. मुहर्रम पर्व से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव का परिचय पाठ के आधार पर दें ।
उत्तर – बिस्मिल्लाह खाँ और शहनाई के साथ जिस मुस्लिम पर्व का नाम जुड़ा है, वह मुहर्रम है। मुहर्रम का महीना वह होता है, जब शिया मुस्लिम हजरत इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति शोक मनाते हैं। बिस्मिल्लाह खाँ के खानदान का कोई भी व्यक्ति न तो शहनाई बजाता था और न ही किसी संगीत के कार्यक्रम में हिस्सा ही लेता था।
आठवीं तारीख बिस्मिल्लाह खाँ के लिए खास महत्व की थी। उस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी से फतमान के करीब 8 किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए नौहा ( शहनाई) बजाते हुए जाते थे।
नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 5. ‘संगीतमय कचौड़ी’ का आप क्या अर्थ समझते हैं ?
उत्तर – कुलसुम हलवाई की कचौड़ी को संगीतमय कचौड़ी कहा गया है। जब कुलसुम अत्यंत गर्म घी में कचौड़ी डालती थी, तो उस समय छन से आवाज उठती थी, जिसमें बिस्मिल्लाह खाँ को संगीत के आरोह-अवरोह सुनाई देते थे। इसलिए उस कचौड़ी को संगीतमय कचौड़ी कहा गया है। वे कचौड़ियाँ बिस्मिल्लाह खाँ को संगीत और स्वाद दोनों का आनंद देती थीं।
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प्रश्न 6. बिस्मिल्ला खाँ जब काशी से बाहर प्रदर्शन करते थे तो क्या करते थे ? इससे हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर – अपने मजहब के प्रति अत्यधिक समर्पित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ और बालाजी के प्रति अगाध थी। जब भी वे काशी से बाहर रहते थे, तब विश्वनाथ जी और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे। थोड़ी देर ही सही, मगर उस ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता था और बिस्मिल्लाह खाँ के भीतर की आस्था संगीतमय होकर बाबा विश्वनाथ और बालाजी के श्रीचरणों में समर्पित होने लगती थी।
बिस्मिल्लाह खाँ के इस आचरण से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सांप्रदायिक भेदभाव से मुक्त होकर सच्चा इंसान बनना चाहिए।
नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 7. ‘बिस्मिल्ला खाँ का मतलब बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई ।’ एक कलाकार के रूप में बिस्मिल्ला खाँ का परिचय पाठ के आधार पर दें।
उत्तर – बिस्मिल्लाह खाँ शहनाई के प्रति इस प्रकार समर्पित हैं कि ये दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। बिस्मिल्लाह खाँ का नाम सुनते ही मानस पटल पर शहनाई की आकृति उभर आती है और चित्त में इसकी आकर्षक मधुर आवाज गूंजने लगती है। शहनाई शब्द कानों में पड़ता है, तो बिस्मिल्लाह खाँ का संगीतमय व्यक्तित्व सामने आकर खड़ा हो जाता है।
शहनाई और बिस्मिल्लाह खाँ की अभिन्नता अपूर्व है। लगातार 80 वर्ष तक कठोर साधना की, तब वह हासिल कर सके उस मंजिल को, जहाँ पहुँचने के लिए हर कलाकार सपना देखता है। शहनाई वादन में उन्हें वह प्रसिद्धि मिली, जिसके लिए कोई कलाकार सपना सँजोता है। इसलिए जब बिस्मिल्लाह खाँ शब्द कानों में गूँजता है, तब बिस्मिल्लाह खाँ का व्यक्तित्व शहनाई की आकृति और उसके मधुर संगीत में खो जाता है और केवल शहनाई ही दिखाई पड़ती है।
नौबतखाने में इबादत – Naubatkhane Mein Ibadat Class 10
प्रश्न 8. आशय स्पष्ट करें
प्रश्न (क) फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सिल जाएगी ।
उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘नौबतखाने में इबादत’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसके रचनाकार यतीन्द्र मिश्र हैं। यहाँ पर लेखक यह कहना चाहता है कि बिस्मिल्लाह खाँ निश्चल और सरल व्यक्तित्व के थे। उनमें बनावटीपन बिल्कुल भी नहीं था। भारत रत्न मिलने के बाद भी उन्हें फटी तहमद पहनने में कोई संकोच नहीं होता था।
एक दिन उनकी शिष्या ने उनकी फटी तहमद के लिए कहा कि यह अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं। इस पर बिस्मिल्लाह खाँ ने कहा, “मुझे भारत रत्न शहनाई पर मिला है, लुंगिया पर नहीं। यदि मैंने अपनी वेशभूषा पर ध्यान दिया होता, तो शहनाई ही हमसे रूठ गई होती। लुंगी तो आज फटी है तो कल सी जाएगी, पर सुर फटने के बाद उसे संभाला नहीं जा सकता है।”
प्रश्न (ख) काशी संस्कृति की पाठशाला है ।
उत्तर – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘नौबतखाने में इबादत’ शीर्षक पाठ से ली गई हैं। इसके रचनाकार यतीन्द्र मिश्र हैं।
काशी को संस्कृति की पाठशाला कहा गया है। यहाँ रहकर हम सांस्कृतिक गुणों से संपन्न हो सकते हैं। यह धर्म और धार्मिक सद्भाव की नगरी है। यह कलाकारों और उनकी साधना की नगरी है। यह विभिन्न कलाओं में निपुण हनुमान जी की नगरी है। काशी में नृत्य-संगीत और विश्वनाथ जी का वास है, इसलिए काशी को संस्कृति की पाठशाला कहा गया है।
प्रश्न 9. बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का वर्णन पाठ के आधार पर दें।
उत्तर – अमीरुद्दीन (बिस्मिल्लाह खाँ) का जन्म डुमरांव, बिहार के एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। 5-6 वर्ष डुमरांव में बिताकर वे अपने नाना के घर काशी आ गए। यहीं उनका सारा जीवन बीता। जब वे छोटे थे, तब छिपकर अपने नाना को शहनाई बजाते हुए सुना करते थे। बिस्मिल्लाह खाँ को बचपन में फिल्म देखने का बड़ा शौक था। गीता बाली और सुलोचना की तो वे कोई फिल्म नहीं छोड़ते थे।
14 वर्ष की उम्र में बिस्मिल्लाह खाँ नौबतखाने में रियाज के लिए जाने लगे। नौबतखाने वाले रास्ते में बालाजी का मंदिर पड़ता था और उसी रास्ते में दो संगीत प्रेमी बहनों का भी घर था, जिनके नाम रसूलनबाई और बतूलनबाई थे। बिस्मिल्लाह खाँ को संगीत की वास्तविक प्रेरणा इन दो संगीत प्रेमी बहनों से मिली। रसूलन और बतूलन जब गाती थीं, तब खाँ साहब को बड़ी खुशी होती थी। इस प्रकार से खाँ साहब की अबूझ उम्र में अंकित स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला रसूलन और बतूलन ने ही लिखी है।
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