अंधा युग: वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता

धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘अंधा युग’ केवल हिंदी साहित्य की एक कालजयी कृति नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विश्व के लिए एक नैतिक दर्पण है। 1954 में लिखा गया यह काव्य-नाटक महाभारत के अठारहवें दिन की संध्या से लेकर कृष्ण की मृत्यु तक के कालखंड पर आधारित है।

यद्यपि इसकी कथावस्तु पौराणिक है, लेकिन इसमें उठाए गए प्रश्न—युद्ध की विभीषिका, नैतिक पतन और मानवीय हताशा—आज के 2026 के वैश्विक परिदृश्य में भी उतने ही जीवंत हैं जितने सात दशक पहले थे।

अंधा युग नाटक कि वर्तमान में प्रासंगिकता

1. युद्ध की निरर्थकता और आधुनिक विश्व

‘अंधा युग’ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की त्रासदी और परमाणु बम के विभीषिका के साये में लिखा गया था। आज जब हम रूस-यूक्रेन या मध्य-पूर्व के संघर्षों को देखते हैं, तो भारती जी की पंक्तियाँ सच होती प्रतीत होती हैं।

  • विनाशकारी परिणाम: नाटक दिखाता है कि युद्ध में कोई पक्ष जीतता नहीं है; अंततः दोनों पक्ष पराजित होते हैं। कौरव पक्ष वैचारिक रूप से अंधा था, तो पांडव पक्ष ने अनैतिकता का सहारा लिया।
  • अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र: नाटक में अश्वत्थामा द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र आज के परमाणु हथियारों (Nuclear Weapons) का प्रतीक है। जिस प्रकार ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से आने वाली पीढ़ियाँ विकलांग पैदा होती हैं, वही डर आज के “न्यूक्लियर वॉर” को लेकर बना हुआ है।

2. नैतिक मूल्यों का पतन और ‘अंधापन’

नाटक का शीर्षक ‘अंधा युग’ स्वयं में एक महान रूपक है। यह केवल धृतराष्ट्र के शारीरिक अंधेपन की बात नहीं करता, बल्कि यह वैचारिक और नैतिक अंधेपन की ओर संकेत करता है।

  • विवेक का अभाव: धृतराष्ट्र अपनी पुत्र-मोह में अंधे थे। आज के दौर में यह अंधापन ‘कट्टरपंथ’, ‘अंध-राष्ट्रवाद’ और ‘स्वार्थ’ के रूप में दिखाई देता है।
  • सत्ता की लोलुपता: राजनीति में ऊँचे आदर्शों की जगह ‘साम-दाम-दंड-भेद’ ने ले ली है। गांधारी का शाप और धृतराष्ट्र का आत्म-मोह आज के राजनीतिक गलियारों की कड़वी सच्चाई है।

3. अश्वत्थामा: कुंठा और प्रतिशोध का प्रतीक

आज के युवाओं में बढ़ती कुंठा, अवसाद और हिंसक प्रवृत्ति को ‘अश्वत्थामा’ के चरित्र के माध्यम से समझा जा सकता है।

  • अमानवीयता: अश्वत्थामा एक ऐसा पात्र है जो युद्ध की क्रूरता के कारण अपनी मानवीय संवेदनाएं खो चुका है। वह ‘अर्ध-सत्य’ (नरो वा कुंजरो वा) का शिकार है।
  • प्रतिशोध की आग: जब समाज में न्याय की उम्मीद खत्म हो जाती है, तो व्यक्ति अश्वत्थामा की तरह हिंसक हो जाता है। आज का ‘आतंकवाद’ और ‘घृणा अपराध’ (Hate Crimes) इसी कुंठित मानसिकता के आधुनिक संस्करण हैं।

4. कृष्ण: मर्यादा और उत्तरदायित्व

नाटक में कृष्ण एक ‘ईश्वर’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘मानव’ के रूप में उपस्थित हैं जो संघर्षरत है। वे मर्यादा और सृजन के प्रतीक हैं।

  • कर्म का सिद्धांत: कृष्ण कहते हैं कि भले ही युग अंधा हो, लेकिन व्यक्ति के पास ‘चुनने’ की स्वतंत्रता होती है। यह संदेश आज के दौर में बहुत महत्वपूर्ण है—कि हम विनाश को चुनते हैं या सृजन को।
  • ईश्वर की मृत्यु: नाटक के अंत में कृष्ण की मृत्यु यह दर्शाती है कि अब मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बनना होगा। अब कोई दैवीय शक्ति हमें बचाने नहीं आएगी; हमें अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूंढना होगा।

वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में जुड़ाव

विषय‘अंधा युग’ का संदर्भवर्तमान स्थिति (2026)
तकनीक/शस्त्रब्रह्मास्त्र का प्रयोगएआई (AI) संचालित हथियार और परमाणु भय
मीडिया/सूचनासंजय का ‘सीमित’ दिव्य विजनफेक न्यूज़ और सूचनाओं का तोड़-मरोड़
न्याय प्रणालीअर्ध-सत्य और छलवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिकरण
मानसिक स्वास्थ्यपात्रों की आत्मग्लानि और पागलपनबढ़ता तनाव, अवसाद और अलगाव

क्या ‘अंधा युग’ निराशावादी नाटक है?

कई आलोचक इसे निराशावादी मानते हैं क्योंकि इसका अंत कृष्ण की मृत्यु और एक युग के अवसान से होता है। परंतु, गहराई से देखने पर यह आशावाद का संदेश देता है।

युयुत्सु का आत्मघात और विदुर की चिंता हमें सचेत करती है कि यदि हम समय रहते नहीं संभले, तो परिणाम भयावह होंगे। भारती जी का उद्देश्य डराना नहीं, बल्कि जगाना था। वे स्पष्ट करते हैं कि “अंधों के माध्यम से ज्योति की कथा” कहना ही इस नाटक का मूल उद्देश्य है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, ‘अंधा युग’ केवल द्वापर युग की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस युग की कहानी है जहाँ मनुष्य अपनी मानवता खो देता है।

आज के डिजिटल और परमाणु युग में, जहाँ संवेदनशीलता कम हो रही है और शक्ति का प्रदर्शन ही अंतिम सत्य माना जा रहा है, वहाँ ‘अंधा युग’ हमें चेतावनी देता है। यह हमें सिखाता है कि युद्ध कभी समस्या का समाधान नहीं हो सकता और अंतिम विजय केवल उसी की होती है जो घृणा के बीच भी प्रेम और सृजन को जीवित रखता है।

एक छात्र के रूप में, इस नाटक का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का वह ‘संजय’ है जो हमें कटु सत्य दिखाने का साहस रखता है।

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