अंधेर नगरी का उद्देश्य पर टिप्पणी

भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित ‘अंधेर नगरी’ हिंदी साहित्य का एक कालजयी प्रहसन (Comedy/Satire) है। 1881 में लिखा गया यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। कॉलेज असाइनमेंट की दृष्टि से, इस नाटक के मुख्य उद्देश्यों को समझना अनिवार्य है।


अंधेर नगरी: नाटक का मुख्य उद्देश्य और प्रासंगिकता

भारतेंदु जी ने इस नाटक की रचना मात्र मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज और सत्ता की विसंगतियों पर प्रहार करने के लिए की थी। इस नाटक के माध्यम से लेखक ने निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों को रेखांकित किया है:

1. विवेकहीन शासन व्यवस्था की पोल खोलना

नाटक का सबसे प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसी सत्ता का चित्रण करना है जहाँ राजा मूर्ख है और न्याय व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त है। ‘अंधेर नगरी’ का राजा विवेकहीनता का प्रतीक है।

“अंधेर नगरी अनबूझ राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा।” यह प्रसिद्ध पंक्ति दर्शाती है कि जहाँ गुण और दोष, योग्य और अयोग्य के बीच कोई भेद न हो, वह राज्य विनाश की ओर जाता है। भारतेंदु यह संदेश देना चाहते थे कि बिना बुद्धि और न्याय के शासन अधिक समय तक नहीं टिक सकता।

2. तत्कालीन ब्रिटिश शासन पर व्यंग्य

ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो यह नाटक सीधे तौर पर तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत (अंग्रेजी शासन) की नीतियों पर कटाक्ष करता है। उस समय की अदालती व्यवस्था और कानून इतने पेचीदा और तर्कहीन थे कि निर्दोष को सजा मिल जाती थी और दोषी बच निकलते थे। नाटक में ‘बकरी के मरने’ पर जिस तरह का मुकदमा चलता है, वह ब्रिटिश काल की विसंगतिपूर्ण कानूनी व्यवस्था का एक रूपक (Metaphor) है।

3. सामाजिक कुरीतियों और जड़ता पर प्रहार

भारतेंदु जी ने नाटक के माध्यम से समाज में व्याप्त लालच, स्वार्थ और अज्ञानता को भी उजागर किया है। गोवर्धन दास का पात्र उस आम जनता का प्रतिनिधित्व करता है जो सस्ते और आसान सुख के चक्कर में अपने प्राणों को संकट में डाल लेती है। लेखक का उद्देश्य जनता को यह समझाना था कि जिस समाज में मूल्यों का ह्रास हो जाता है, वहाँ कोई भी सुरक्षित नहीं है।

4. कर्म और परिणाम का सिद्धांत

नाटक का एक उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना भी है। महंत जी (गुरु) के माध्यम से लेखक यह बताते हैं कि जिस स्थान पर सम्मान और अपमान में अंतर न हो, वहाँ रहना आत्मघाती है। गोवर्धन दास अपने गुरु की सलाह न मानकर लालच में वहीं रुक जाता है और अंत में फाँसी के फंदे तक पहुँच जाता है। यह पाठकों को ‘लोभ’ और ‘अति-मोह’ के दुष्परिणामों से सचेत करता है।

5. न्याय का हास्यास्पद स्वरूप

नाटक के अंतिम दृश्य में फाँसी का फंदा ‘बड़ा’ होने के कारण किसी भी मोटे व्यक्ति को फाँसी पर लटका देने का आदेश दिया जाता है। यह न्याय की उस विडंबना को दिखाता है जहाँ कानून की प्रक्रिया (Process) सत्य से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। यह आज के समय की नौकरशाही और लालफीताशाही (Red-tapism) पर भी एक गहरा प्रहार है।


निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में, ‘अंधेर नगरी’ का उद्देश्य केवल हँसाना नहीं, बल्कि ‘हँसाते-हँसाते जगाना’ है। भारतेंदु जी चाहते थे कि जनता अपनी राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के प्रति सचेत हो। वे एक ऐसे समाज की कल्पना कर रहे थे जहाँ न्याय का आधार तर्क और मानवता हो, न कि राजा की सनक।

यह नाटक हमें सिखाता है कि:

  • स्वार्थी और मूर्ख शासक देश को पतन की ओर ले जाता है।
  • जनता को अंधानुकरण और लोभ का त्याग करना चाहिए।
  • बुद्धि और विवेक ही जीवन के सबसे बड़े रक्षक हैं।

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