“रावरे रूप की रीति अनूप नयो नयो लागत ज्यों-ज्यों निहारिए। त्यों इन आँखिन बननि अनोखी अघानि कहूँ नहीं आन तिहारिए।।” सप्रसंग व्याख्या।
संदर्भ: यह पंक्ति बिहारीलाल की प्रसिद्ध कृति “बिहारी सतसई” से ली गई है। बिहारीलाल हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख …