समांतर कहानी आंदोलन क्या है? कमलेश्वर के नेतृत्व में शुरू हुए इस साहित्यिक आंदोलन की विशेषताएँ, प्रमुख रचनाकार और आम आदमी के संघर्ष पर इसके प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण यहाँ पढ़ें। कॉलेज असाइनमेंट के लिए एक संपूर्ण गाइड।
समांतर कहानी
हिन्दी कहानी के विकासक्रम में 1970 के आसपास का समय एक बड़ी वैचारिक क्रांति का गवाह बना। इसी दौर में कमलेश्वर के संपादन और नेतृत्व में ‘समांतर कहानी’ आंदोलन का उदय हुआ। यह आंदोलन केवल साहित्यिक चर्चा तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उस समय के ‘आम आदमी’ की वास्तविक स्थितियों को साहित्य के केंद्र में लाने का एक साहसिक प्रयास था।
समांतर कहानी का उद्भव और पृष्ठभूमि
1960 के दशक के ‘नई कहानी’ आंदोलन के बाद हिन्दी साहित्य में एक ठहराव महसूस किया जाने लगा था। जहाँ नई कहानी वैयक्तिक संबंधों, अकेलेपन और महानगरीय बोध पर केंद्रित थी, वहीं समांतर कहानी ने साहित्य को ड्राइंग रूम से निकालकर खेत, खलिहान और दफ्तरों की कड़वी सच्चाई से जोड़ा।
कमलेश्वर ने ‘सारिका’ पत्रिका के माध्यम से इस आंदोलन को गति दी। उनका मानना था कि कहानी को केवल मनोरंजन या कलात्मक विलासिता का साधन नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे समाज के बहुसंख्यक वर्ग के संघर्षों के ‘समांतर’ चलना चाहिए।
समांतर कहानी की प्रमुख विशेषताएँ
समांतर कहानी आंदोलन की अपनी कुछ मौलिक विशेषताएँ थीं जो इसे अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों से अलग करती थीं:
1. आम आदमी की प्रतिष्ठा
इस आंदोलन ने ‘महान नायकों’ के बजाय उस साधारण मनुष्य को नायक बनाया जो रोजमर्रा की रोटी, बेरोजगारी और सामाजिक शोषण से जूझ रहा था। यहाँ का नायक कोई आदर्शवादी व्यक्ति नहीं, बल्कि वह आम आदमी है जो परिस्थितियों से लड़ रहा है।
2. राजनैतिक और सामाजिक चेतना
समांतर कहानीकारों का मानना था कि व्यक्ति की समस्याएँ केवल उसकी निजी समस्याएँ नहीं हैं, बल्कि वे व्यवस्था की देन हैं। इसलिए, इन कहानियों में राजनीतिक भ्रष्टाचार, नौकरशाही की संवेदनहीनता और सामाजिक विषमता पर कड़ा प्रहार किया गया।
3. यथार्थवाद पर जोर
जहाँ ‘अकहानी’ मोहभंग और कुंठा की बात करती थी, वहीं समांतर कहानी ने ठोस यथार्थ की बात की। इसमें कल्पना की उड़ान कम और ज़मीनी हकीकत का चित्रण अधिक मिलता है। यह जीवन की विद्रूपताओं को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करती है।
4. प्रतिबद्धता (Commitment)
इस आंदोलन का एक प्रमुख नारा था—“साहित्य की प्रतिबद्धता आम आदमी के प्रति।” रचनाकारों का मानना था कि लेखक का धर्म समाज के पीड़ित वर्ग के साथ खड़े होना है।
प्रमुख रचनाकार और उनका योगदान
समांतर कहानी आंदोलन को समृद्ध करने में कई महत्वपूर्ण लेखकों की भूमिका रही है:
- कमलेश्वर: इस आंदोलन के प्रणेता। उनकी कहानियाँ व्यवस्था के दोहरेपन को उजागर करती हैं।
- मधुकर सिंह: इन्होंने ग्रामीण अंचलों के शोषण और वहाँ पनपते जन-आक्रोश को प्रमुखता से चित्रित किया।
- दामोदर सदन: इनकी कहानियों में औद्योगिक मजदूरों और निम्न मध्यवर्गीय जीवन की जद्दोजहद दिखाई देती है।
- जितेन्द्र भाटिया, श्रवण कुमार और से.रा. यात्री: इन लेखकों ने भी अपने-अपने स्तर पर महानगरीय और कस्बाई जीवन की विसंगतियों को समांतर कहानी के ढांचे में पिरोया।
समांतर कहानी बनाम नई कहानी
अक्सर छात्र इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं। संक्षिप्त में इनका अंतर यहाँ समझा जा सकता है:
| आधार | नई कहानी | समांतर कहानी |
| केंद्र बिंदु | व्यक्ति की आंतरिक मनःस्थिति और अकेलेपन का बोध। | समाज के बहुसंख्यक वर्ग का बाहरी और सामूहिक संघर्ष। |
| दृष्टिकोण | मध्यमवर्गीय महानगरीय जीवन की संवेदना। | आम आदमी की आर्थिक और राजनीतिक चेतना। |
| उद्देश्य | कलात्मक अभिव्यक्ति और नवीनता। | सामाजिक बदलाव और व्यवस्था के प्रति आक्रोश। |
आंदोलन की सीमाएँ और आलोचना
हर बड़े आंदोलन की तरह समांतर कहानी की भी कुछ सीमाएँ रहीं। आलोचकों का मानना है कि कभी-कभी सामाजिक प्रतिबद्धता के चक्कर में इन कहानियों में ‘कलात्मकता’ गौण हो गई और वे केवल राजनीतिक नारे बनकर रह गईं। कुछ कहानियों में सीधा संवाद और प्रचारवादी लहजा इतना हावी हो गया कि कहानी की बुनावट कमजोर पड़ने लगी।
साथ ही, 1980 के दशक तक आते-आते यह आंदोलन वैचारिक बिखराव का शिकार हो गया, क्योंकि समाज और राजनीति की चुनौतियाँ बदलने लगी थीं।
निष्कर्ष
समांतर कहानी हिन्दी साहित्य का वह महत्वपूर्ण मोड़ है जिसने लेखक को उसकी सामाजिक जिम्मेदारी याद दिलाई। इसने साहित्य को अभिजात्य वर्ग के चंगुल से मुक्त कर पसीने की गंध और संघर्ष की आवाज़ से जोड़ा। आज भी जब हम दलित विमर्श या स्त्री विमर्श की बात करते हैं, तो उसकी जड़ें कहीं न कहीं समांतर कहानी द्वारा पैदा की गई ‘चेतना’ में ही दिखाई देती हैं।
कुल मिलाकर, समांतर कहानी ने हिन्दी कहानी को एक नई दिशा, नई ऊर्जा और एक नया उद्देश्य प्रदान किया, जिससे वह सीधे जनता से जुड़ सकी।
